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हरियाणा में किसानों की आय ठहरी, कपास की खेती का रकबा घटा

17 अक्तूबर 2026: हरियाणा में मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार के दो साल पूरे होने के बीच कृषि क्षेत्र में किसानों की आमदनी और फसलों की लाभप्रदता को लेकर सवाल उठ रहे हैं। सरकार ने कृषि और इससे जुड़े क्षेत्रों के लिए बजट आवंटन बढ़ाया है और किसानों की सहायता के लिए कई योजनाएं शुरू की हैं, लेकिन खेती की बढ़ती लागत, फसल खराब होने और सरकारी खरीद में देरी जैसी समस्याएं किसानों की चिंता बढ़ा रही हैं। राज्य में कभी प्रमुख नकदी फसल मानी जाने वाली कपास की खेती का रकबा भी लगातार घट रहा है। चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय की रिपोर्ट में गेहूं और कपास की खेती से होने वाली कमाई के आंकड़े कृषि की आर्थिक चुनौतियों को सामने रखते हैं।

गेहूं की खेती से सीमित कमाई

हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय की रिपोर्ट के अनुसार, राज्य में एक एकड़ गेहूं की खेती से औसतन शुद्ध आय लगभग 15,180 रुपये आंकी गई है। छोटे किसानों के लिए इतनी कमाई से परिवार की जरूरतों, खेती के खर्च और अन्य आर्थिक जिम्मेदारियों को पूरा करना मुश्किल हो सकता है। बीज, खाद, कीटनाशक, सिंचाई, मशीनों और मजदूरी पर होने वाला खर्च किसानों की वास्तविक बचत को प्रभावित करता है।

खेती से होने वाली आय पर मौसम की अनिश्चितता और बाजार की परिस्थितियों का भी असर पड़ता है। ऐसे में केवल उत्पादन बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि किसानों को उनकी फसल का उचित मूल्य मिलना और लागत के मुकाबले बेहतर मुनाफा प्राप्त होना भी जरूरी है।

कपास की खेती में भारी गिरावट

हरियाणा में कपास की खेती की स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक बनी हुई है। कृषि विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2019-20 में राज्य में आठ लाख हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में कपास की खेती होती थी। वर्ष 2025-26 के खरीफ सीजन में यह रकबा घटकर लगभग 2.82 लाख हेक्टेयर रह गया। यानी सात वर्षों में कपास की खेती के क्षेत्र में करीब 65 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई।

सिरसा, हिसार और फतेहाबाद जैसे जिले पारंपरिक रूप से हरियाणा के प्रमुख कपास उत्पादक क्षेत्रों में शामिल रहे हैं। इन इलाकों में किसानों के लिए कपास लंबे समय तक आमदनी का महत्वपूर्ण स्रोत रही है। हालांकि, लगातार फसल नुकसान और बढ़ती लागत के कारण अब कई किसान दूसरी फसलों की ओर रुख कर रहे हैं।

कपास किसानों को प्रति एकड़ नुकसान

हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2025 के खरीफ सीजन में कपास की खेती पर औसतन प्रति एकड़ लगभग 40,024 रुपये खर्च हुए, जबकि फसल की बिक्री से करीब 24,882 रुपये की आय प्राप्त हुई। इस हिसाब से किसानों को प्रति एकड़ औसतन लगभग 15,143 रुपये का नुकसान हुआ।

लगातार घाटे के कारण कपास की खेती किसानों के लिए आर्थिक जोखिम बनती जा रही है। किसान ऐसी फसलें चुनने के लिए मजबूर हो रहे हैं जिनमें उन्हें बेहतर कीमत और सरकारी खरीद की अधिक उम्मीद दिखाई देती है।

कीटों और मौसम ने बढ़ाई मुश्किलें

कपास की फसल पर गुलाबी सुंडी जैसे कीटों का हमला उत्पादन को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारणों में शामिल है। कीटों के प्रकोप को नियंत्रित करने के लिए किसानों को कीटनाशकों पर अतिरिक्त खर्च करना पड़ता है। इसके बावजूद कई बार फसल को नुकसान से बचाना मुश्किल हो जाता है।

इसके साथ ही अनियमित बारिश, अत्यधिक वर्षा और खेतों में जलभराव जैसी परिस्थितियां भी कपास की पैदावार को प्रभावित करती हैं। जब उत्पादन घटता है और खेती की लागत बढ़ती है, तो किसानों का मुनाफा कम हो जाता है। लगातार नुकसान झेलने के बाद कई किसान कपास की जगह दूसरी फसलों को प्राथमिकता दे रहे हैं।

बाजरा और धान की ओर बढ़ रहा रुझान

कपास की खेती में गिरावट के साथ किसानों के फसल चयन में भी बदलाव दिखाई दे रहा है। दक्षिण हरियाणा के कम पानी वाले क्षेत्रों में कई किसान बाजरा और ग्वार जैसी फसलों की ओर बढ़ रहे हैं, जबकि पर्याप्त सिंचाई की सुविधा वाले कुछ इलाकों में धान की खेती का रुझान बढ़ा है।

हालांकि, धान की खेती से अपेक्षाकृत सुनिश्चित सरकारी खरीद मिलने की उम्मीद किसानों को आकर्षित करती है, लेकिन यह फसल अधिक पानी की मांग करती है। इसलिए कपास का रकबा घटना केवल किसानों की आय का मुद्दा नहीं है, बल्कि राज्य में भूजल संरक्षण और फसल विविधीकरण के लक्ष्यों के लिए भी चुनौती बन सकता है।

सरकारी योजनाओं के बावजूद चुनौती बरकरार

हरियाणा सरकार ने कपास उत्पादकों को प्रोत्साहित करने के लिए आर्थिक सहायता और कृषि संबंधी योजनाएं लागू की हैं। अगस्त 2026 में राज्य सरकार ने सूक्ष्म पोषक तत्वों और एकीकृत कीट प्रबंधन यानी इंटीग्रेटेड पेस्ट मैनेजमेंट के लिए सहायता देने की घोषणा की थी। इसके तहत पात्र किसानों को निर्धारित शर्तों के अनुसार अधिकतम दो एकड़ तक सहायता मिल सकती है।

इसके अलावा, भावांतर भरपाई योजना के माध्यम से कुछ फसलों की बिक्री कीमत न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम रहने पर किसानों को आर्थिक राहत देने का प्रावधान है। हालांकि, किसानों ने योजना के लाभ, पंजीकरण और भुगतान व्यवस्था में कथित अनियमितताओं को लेकर भी सवाल उठाए हैं। कुछ मामलों में गड़बड़ियों की जांच के लिए प्राथमिकी दर्ज किए जाने की खबरें सामने आई हैं।

सरकारी खरीद और भुगतान पर भी नजर

वर्तमान खरीफ सीजन में खरीद प्रक्रिया की धीमी गति और कुछ फसलों की खरीद शुरू होने में देरी ने किसानों की परेशानियां बढ़ाई हैं। किसानों के लिए समय पर खरीद, पारदर्शी पंजीकरण और भुगतान की स्पष्ट व्यवस्था जरूरी है, ताकि उन्हें अपनी उपज बेचने के लिए लंबा इंतजार न करना पड़े।

मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी सरकार ने किसानों की आय बढ़ाने, फसल विविधीकरण को प्रोत्साहित करने और कृषि वैज्ञानिकों के सहयोग से बेहतर बीज तथा तकनीक विकसित करने पर जोर दिया है। सरकार के सामने अब बड़ी चुनौती इन योजनाओं का लाभ वास्तविक किसानों तक पहुंचाने और खेती को आर्थिक रूप से टिकाऊ बनाने की है।

कुल मिलाकर, हरियाणा में कपास के घटते रकबे और खेती से सीमित आमदनी के आंकड़े बताते हैं कि कृषि क्षेत्र में केवल बजट बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। किसानों को बेहतर उत्पादन, लागत में कमी, प्रभावी कीट नियंत्रण, समय पर सरकारी खरीद और लाभकारी कीमतों की जरूरत है। इन मोर्चों पर सुधार होने से ही किसानों का भरोसा कपास जैसी नकदी फसलों में दोबारा बढ़ सकता है।

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