14 अक्टूबर 2026: पंजाब में नशे की समस्या के बीच अमृतसर जिले के बुटाला गांव ने खेलों के जरिए युवाओं को सकारात्मक दिशा देने की मिसाल पेश की है। बाबा बकाला के पास स्थित इस गांव में हॉकी की मजबूत परंपरा रही है। गांव के लोगों का मानना है कि खेलों से जुड़ाव युवाओं को नशे से दूर रखने और उन्हें अपने भविष्य के प्रति गंभीर बनाने में मदद करता है। यहां हॉकी केवल एक खेल नहीं, बल्कि नई पीढ़ी को बेहतर अवसर देने का माध्यम बन चुकी है।
द ट्रिब्यून की 14 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, बुटाला गांव में बाबा पल्ला स्पोर्ट्स क्लब के माध्यम से रोजाना करीब 150 बच्चे हॉकी का प्रशिक्षण लेते हैं। बच्चों के लिए सुबह और शाम अभ्यास सत्र आयोजित किए जाते हैं। इस व्यवस्था का उद्देश्य गांव की युवा प्रतिभाओं को उचित प्रशिक्षण देना और उन्हें खेलों में आगे बढ़ने का अवसर उपलब्ध कराना है। क्लब के प्रयासों से कई खिलाड़ी विभिन्न स्तरों की प्रतियोगिताओं में हिस्सा ले चुके हैं।
बुटाला में हॉकी का इतिहास लगभग 75 साल पुराना है। गांव के निरंजन सिंह और सरकारी हाई स्कूल के तत्कालीन मुख्याध्यापक करम सिंह ने स्कूल के मैदान को हॉकी ग्राउंड के रूप में विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इसके बाद बाबा पल्ला हॉकी टूर्नामेंट की शुरुआत हुई। धीरे-धीरे इस प्रतियोगिता में आसपास के गांवों की टीमें भी हिस्सा लेने लगीं। समय के साथ यह मैदान स्थानीय खिलाड़ियों और खेल प्रेमियों के लिए एक महत्वपूर्ण केंद्र बन गया।
हालांकि, गांव में हॉकी प्रतियोगिताएं लोकप्रिय होने के बावजूद शुरुआती दौर में बच्चे अधिकतर दर्शक बनकर ही मैदान तक पहुंचते थे। उन्हें नियमित प्रशिक्षण देने और खेल में सक्रिय रूप से शामिल करने की जरूरत महसूस हुई। इसी उद्देश्य से वर्ष 2009 में बाबा पल्ला स्पोर्ट्स क्लब की स्थापना की गई। खेलों में रुचि रखने वाले हरप्रीत सिंह लाली और अन्य लोगों के प्रयासों से बच्चों को व्यवस्थित प्रशिक्षण देने की पहल शुरू हुई। क्लब ने अलग-अलग आयु वर्ग के खिलाड़ियों को तैयार करने के लिए दो कोच भी नियुक्त किए।
युवा खिलाड़ियों को प्रतियोगिताओं का अनुभव दिलाने के लिए क्लब ने श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जूनियर हॉकी गोल्ड कप भी शुरू किया। इसमें अंडर-14 और अंडर-17 वर्ग के मुकाबले आयोजित किए जाते हैं। ऐसी प्रतियोगिताओं से बच्चों को अपनी प्रतिभा दिखाने, दूसरे खिलाड़ियों से सीखने और बड़े स्तर पर खेलने की तैयारी करने का अवसर मिलता है। नियमित अभ्यास के साथ प्रतिस्पर्धी मैच खिलाड़ियों के आत्मविश्वास और खेल कौशल को मजबूत करने में मदद कर सकते हैं।
बुटाला की खेल परंपरा से जुड़े खिलाड़ियों में ओलंपियन और अर्जुन पुरस्कार प्राप्त दिलप्रीत सिंह का नाम प्रमुख है। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व किया है। गांव के प्रभजोत सिंह ने भी अंतरराष्ट्रीय हॉकी मुकाबलों में अपनी पहचान बनाई है। इनके अलावा गांव के सैकड़ों खिलाड़ी अलग-अलग स्तरों पर टीमों का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। इन खिलाड़ियों की उपलब्धियां स्थानीय बच्चों को खेलों में करियर बनाने के लिए प्रेरित करती हैं।
खेलों का फायदा केवल मैदान तक सीमित नहीं रहा है। क्लब से प्रशिक्षण लेने वाले कई युवाओं को खेल कोटे के माध्यम से सरकारी विभागों में नौकरी पाने का अवसर भी मिला है। इससे स्थानीय परिवारों का भरोसा बढ़ा है कि खेलों में मेहनत करने से भविष्य के लिए नए रास्ते खुल सकते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में जहां रोजगार और संसाधनों तक पहुंच चुनौतीपूर्ण हो सकती है, वहां खेलों से जुड़ी उपलब्धियां युवाओं को अपने लक्ष्य तय करने में मदद करती हैं।
क्लब से जुड़े हरप्रीत सिंह लाली का मानना है कि गांव में खेलों की संस्कृति ने युवाओं को रचनात्मक गतिविधियों से जोड़े रखने में भूमिका निभाई है। उनके अनुसार, जब बच्चे नियमित रूप से हॉकी और अन्य खेलों में हिस्सा लेते हैं, तो उन्हें अनुशासन, टीम भावना और लक्ष्य के साथ काम करने का अवसर मिलता है। हालांकि, केवल खेलों को नशे की समस्या का पूर्ण समाधान नहीं माना जा सकता। नशे की रोकथाम के लिए परिवारों, शिक्षकों, समुदाय, स्वास्थ्य सेवाओं और पुनर्वास सुविधाओं की भूमिका भी महत्वपूर्ण है।
बुटाला गांव का अनुभव दिखाता है कि स्थानीय स्तर पर लगातार प्रयास करके बच्चों को खेलों से जोड़ने के अवसर बढ़ाए जा सकते हैं। बाबा पल्ला स्पोर्ट्स क्लब में रोजाना अभ्यास करने वाले करीब 150 बच्चों के साथ गांव की हॉकी परंपरा आगे बढ़ रही है। बेहतर खेल मैदान, प्रशिक्षित कोच और प्रतियोगिताओं में भागीदारी जैसे प्रयास पंजाब के अन्य गांवों के लिए भी उपयोगी उदाहरण बन सकते हैं। खेलों के माध्यम से युवाओं को अवसर देना नशे के खिलाफ व्यापक सामाजिक प्रयासों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकता है।
