1 अगस्त, 2026 : सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर रील्स और शॉर्ट वीडियो की बढ़ती लोकप्रियता का असर अब पारंपरिक कला विधाओं पर भी दिखाई देने लगा है। कला विशेषज्ञों और प्रशिक्षकों का मानना है कि तेजी से बदलती डिजिटल संस्कृति के कारण युवाओं का रुझान शास्त्रीय नृत्य की तुलना में छोटे और त्वरित मनोरंजन वाले कंटेंट की ओर अधिक बढ़ रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि भरतनाट्यम, कथक, ओडिसी और कुचिपुड़ी जैसी शास्त्रीय नृत्य शैलियों में वर्षों के अनुशासित प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है, जबकि सोशल मीडिया पर वायरल होने वाले छोटे वीडियो तुरंत लोकप्रियता दिला देते हैं।
डिजिटल प्लेटफॉर्म का बढ़ता प्रभाव
रील्स और शॉर्ट वीडियो के बढ़ते चलन ने युवाओं के मनोरंजन और अभिव्यक्ति के तरीकों में बड़ा बदलाव किया है। इसके चलते पारंपरिक कलाओं को सीखने में लगने वाला समय और धैर्य कई युवाओं के लिए चुनौती बनता जा रहा है।
गुरु और कलाकारों की चिंता
शास्त्रीय नृत्य से जुड़े कलाकारों का कहना है कि यदि नई पीढ़ी का जुड़ाव कम होता गया तो देश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत पर असर पड़ सकता है। उनका मानना है कि आधुनिक तकनीक का उपयोग करते हुए शास्त्रीय कला को भी नए तरीके से प्रस्तुत करने की आवश्यकता है।
परंपरा और तकनीक के संतुलन पर जोर
विशेषज्ञों का सुझाव है कि सोशल मीडिया को शास्त्रीय नृत्य के प्रचार-प्रसार के प्रभावी माध्यम के रूप में इस्तेमाल किया जाए, ताकि युवा मनोरंजन के साथ-साथ भारतीय सांस्कृतिक विरासत से भी जुड़े रहें।
