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इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा, तलाक का अधिकार केवल सक्षम न्यायालय को

1 जून 2026 : इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि लोक अदालतें तलाक (विवाह विच्छेद) का निर्णय देने का अधिकार नहीं रखतीं। अदालत ने कहा कि वैवाहिक संबंध समाप्त करने का अधिकार केवल सक्षम न्यायालयों के पास है और इसे लोक अदालतों द्वारा प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता।

मामले की सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष यह प्रश्न आया था कि क्या लोक अदालत द्वारा पारित समझौते या आदेश के आधार पर वैध तलाक माना जा सकता है। इस पर विचार करते हुए हाई कोर्ट ने कहा कि विवाह और तलाक से जुड़े मामलों में कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का पालन आवश्यक है।

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि लोक अदालतों का मुख्य उद्देश्य पक्षों के बीच आपसी समझौते को बढ़ावा देना और विवादों का सौहार्दपूर्ण समाधान कराना है। हालांकि, विवाह विच्छेद जैसे मामलों में अंतिम कानूनी निर्णय देने का अधिकार परिवार न्यायालय या संबंधित सक्षम अदालत के पास ही रहता है।

कानून के विशेषज्ञों के अनुसार, भारत में विवाह और तलाक से संबंधित मामलों का निपटारा संबंधित व्यक्तिगत कानूनों और पारिवारिक न्यायालयों के अधिकार क्षेत्र में आता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि लोक अदालतें समझौते की सुविधा प्रदान कर सकती हैं, लेकिन वे वैधानिक अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर ऐसे आदेश पारित नहीं कर सकतीं, जिनके लिए विशेष न्यायिक अधिकार आवश्यक हों।

राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण के तहत आयोजित लोक अदालतों का उद्देश्य न्याय तक आसान और त्वरित पहुंच उपलब्ध कराना है। इनमें अक्सर बैंकिंग, मोटर दुर्घटना दावे, पारिवारिक समझौते और अन्य दीवानी विवादों का निपटारा सहमति के आधार पर किया जाता है।

न्यायशास्त्र से जुड़े जानकारों का कहना है कि यह फैसला न्यायिक अधिकार क्षेत्र और वैधानिक प्रक्रियाओं की सीमाओं को स्पष्ट करता है।

विशेषज्ञों के अनुसार, तलाक केवल दो पक्षों की सहमति का मामला नहीं होता, बल्कि इसमें कानूनी औपचारिकताओं, अधिकारों, भरण-पोषण, बच्चों की अभिरक्षा और अन्य महत्वपूर्ण पहलुओं पर भी विचार किया जाता है।

उत्तर प्रदेश में दिए गए इस फैसले को पारिवारिक कानून से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इससे भविष्य में इसी तरह के मामलों में स्पष्टता आएगी।

अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि न्यायिक प्रक्रिया का पालन करना कानून के शासन और नागरिक अधिकारों की सुरक्षा के लिए आवश्यक है।

भारत में पारिवारिक विवादों के समाधान के लिए लोक अदालतें और मध्यस्थता महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, लेकिन अंतिम वैधानिक निर्णय वही संस्थाएं दे सकती हैं जिन्हें कानून ने यह अधिकार प्रदान किया है।

फिलहाल, इस फैसले को पारिवारिक कानून और वैकल्पिक विवाद समाधान प्रणाली के बीच अधिकारों की सीमाओं को स्पष्ट करने वाला महत्वपूर्ण निर्णय माना जा रहा है।

यह निर्णय दर्शाता है कि न्यायिक अधिकार क्षेत्र से जुड़े मामलों में कानूनी प्रक्रियाओं और संस्थागत भूमिकाओं का पालन करना अनिवार्य है।

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