चंडीगढ़ 17 अप्रैल 2026 : सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा के कच्चे कर्मचारियों और गैस्ट टीचर्स के भविष्य को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक निर्णय सुनाया है। अशोक कुमार बनाम हरियाणा राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के उस फैसले पर अपनी मुहर लगा दी है, जिसमें सरकार को कच्चे कर्मचारियों को पक्का करने का निर्देश दिया गया था। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि जो कर्मचारी वर्षों से अपनी सेवाएं दे रहे हैं, उन्हें अनिश्चितकाल तक एडहॉक या अनुबंध पर नहीं रखा जा सकता।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट का फैसला मिला-जुला फैसला है क्योंकि 2014 की दो नीतियां सुरक्षित रखी गई हैं और एक नीति पर स्थिति स्पष्ट नहीं होने के कारण उसे रद्द कर दिया गया है। जहां एक ओर हजारों कर्मचारियों ने राहत की सांस ली है, वहीं कुछ के लिए चिंता बढ़ गई है। सुप्रीम कोर्ट ने वीरवार को सुनाए अपने आदेश में माना है कि जिन कर्मचारियों ने 10 साल या उससे अधिक की निरंतर सेवा पूरी कर ली है और उनकी नियुक्ति के समय वे निर्धारित योग्यता रखते थे, वे नियमितीकरण के हकदार हैं। कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि यदि नियमित पद खाली नहीं हैं, तो इन कर्मचारियों को समायोजित करने के लिए ‘अधिसंख्य पद’ (सुपरन्यूमरेरी पोस्ट) सृजित किए जाएं।
समान काम-समान वेतन
सुप्रीम कोर्ट ने इस सिद्धांत को दोहराते हुए कहा कि जब तक नियमितीकरण की प्रक्रिया पूरी नहीं होती तब तक इन कर्मचारियों को उनके समकक्ष नियमित कर्मचारियों के न्यूनतम वेतनमान के बराबर भुगतान किया जाना चाहिए। इस फैसले से हरियाणा के हजारों गैस्ट टीचर्स और विभिन्न विभागों में कार्यरत अनुबंध कर्मचारियों की नौकरी जाने का खतरा लगभग समाप्त हो गया है। कोर्ट ने 2011 और उसके बाद की नियमितीकरण नीतियों तहत आने वाले पात्र कर्मचारियों को तुरंत राहत देने को कहा है। कोर्ट ने हरियाणा सरकार को एक निश्चित समय-सीमा के भीतर इस आदेश को लागू करने और पात्र कर्मचारियों की सूची तैयार कर उन्हें
नियमित करने की प्रक्रिया शुरू करने का निर्देश दिया है।
जुलाई 2014 की नीति को किया रद्द
हरियाणा में जो कर्मचारी 16 जून और 18 जून 2014 की नीतियों तहत पक्के हुए थे उनकी नौकरी अब पूरी तरह सुरक्षित हैं। केवल 7 जुलाई 2014 वाली नीति (जिसमें कार्यकाल की शर्तों में कुछ ढील दी गई थी) के दायरे में आने वाले कर्मचारियों को झटका लगा है। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि शुरूआती 2 नीतियां मापदंडों पर खरी उतरती हैं लेकिन 7 जुलाई वाली नीति संवैधानिक प्रक्रियाओं और पुराने दिशा-निर्देशों का उल्लंघन करती थी।
