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संसद से संसदीय क्षेत्र तक, 2030 तक बाल विवाह के खात्मे के लिए एकजुट हुए सांसद

24 मार्च 2026 : देश में बाल विवाह जैसी सामाजिक कुरीति को खत्म करने के लिए अब राजनीतिक स्तर पर भी गंभीर पहल तेज होती दिखाई दे रही है। संसद से लेकर अपने-अपने संसदीय क्षेत्रों तक, विभिन्न दलों के सांसद 2030 तक बाल विवाह के पूर्ण उन्मूलन के लक्ष्य को लेकर एकजुट हो रहे हैं। यह पहल न केवल कानून के सख्त पालन पर जोर देती है, बल्कि समाज में जागरूकता बढ़ाने और व्यवहार में बदलाव लाने की दिशा में भी काम कर रही है।

भारत में बाल विवाह लंबे समय से एक गंभीर सामाजिक समस्या रही है, जो खासकर ग्रामीण और पिछड़े इलाकों में अधिक देखने को मिलती है। हालांकि सरकार ने इसे रोकने के लिए कई कानून बनाए हैं, जिनमें बाल विवाह निषेध अधिनियम 2006 प्रमुख है, लेकिन इसके बावजूद यह प्रथा पूरी तरह खत्म नहीं हो पाई है। इसी को ध्यान में रखते हुए सांसद अब अपने क्षेत्रों में प्रशासन, सामाजिक संगठनों और स्थानीय समुदायों के साथ मिलकर ठोस कदम उठा रहे हैं।

इस अभियान के तहत सांसद अपने क्षेत्रों में जनसभाएं, जागरूकता अभियान और स्कूल-कॉलेजों में कार्यक्रम आयोजित कर रहे हैं, ताकि लोगों को बाल विवाह के दुष्परिणामों के बारे में बताया जा सके। खासतौर पर लड़कियों की शिक्षा, स्वास्थ्य और आत्मनिर्भरता पर जोर दिया जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक समाज में शिक्षा और आर्थिक सशक्तिकरण नहीं बढ़ेगा, तब तक इस कुरीति को पूरी तरह समाप्त करना मुश्किल होगा।

इसके अलावा, कई सांसद स्थानीय प्रशासन के साथ मिलकर बाल विवाह की संभावित घटनाओं पर नजर रखने के लिए निगरानी तंत्र भी मजबूत कर रहे हैं। पंचायत स्तर पर समितियों का गठन किया जा रहा है, जो इस तरह के मामलों की सूचना तुरंत संबंधित अधिकारियों तक पहुंचाएंगी। साथ ही, बाल विवाह कराने वालों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित करने पर भी जोर दिया जा रहा है।

महिला एवं बाल विकास से जुड़े संगठनों और UNICEF जैसे अंतरराष्ट्रीय संस्थानों का भी इस अभियान में सहयोग मिल रहा है। ये संस्थाएं जागरूकता कार्यक्रमों, रिसर्च और नीति निर्माण में मदद कर रही हैं, जिससे इस समस्या से निपटने के लिए एक व्यापक रणनीति तैयार की जा सके।

सांसदों का मानना है कि 2030 तक बाल विवाह के खात्मे का लक्ष्य तभी हासिल किया जा सकता है, जब सरकार, समाज और परिवार सभी मिलकर प्रयास करें। इसके लिए जरूरी है कि न केवल कानूनों का पालन हो, बल्कि लोगों की सोच में भी बदलाव आए। लड़कियों को बोझ नहीं, बल्कि समाज की ताकत के रूप में देखा जाए और उन्हें समान अवसर दिए जाएं।

कुल मिलाकर, संसद से लेकर जमीनी स्तर तक शुरू हुआ यह अभियान एक सकारात्मक पहल है, जो आने वाले वर्षों में बड़े बदलाव का आधार बन सकता है। अगर यह प्रयास निरंतर और समन्वित तरीके से जारी रहे, तो भारत निश्चित रूप से 2030 तक बाल विवाह जैसी कुरीति से मुक्त होने की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल कर सकता है।

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