चंडीगढ़ 21 मार्च 2026 : पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने कैथल जिले में राजा मिहिर भोज की प्रतिमा को लेकर गुर्जर और राजपूत समुदायों के बीच चले आ रहे विवाद से संबंधित याचिका का निपटारा कर दिया।
अदालत ने स्पष्ट कहा कि समय के साथ यह विवाद अपनी ‘तीव्रता खो चुका है’ और ऐसे मामलों में न्यायालय का समय व्यर्थ नहीं किया जाना चाहिए। चीफ जस्टिस शील नागू और जस्टिस हरप्रीत कौर जीवन की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा कि यह मामला प्रशासनिक और सामाजिक स्तर पर सुलझाया जा सकता है। अदालत ने टिप्पणी की कि ऐसे मामलों में अदालत को अनावश्यक रूप से घसीटना न्यायिक संसाधनों की बर्बादी है।
यह विवाद जुलाई 2023 में उस समय सामने आया था, जब कैथल में नौवीं शताब्दी के शासक मिहिर भोज की प्रतिमा स्थापित की गई और उस पर ‘गुर्जर प्रतिहार’ लिखे जाने पर राजपूत समुदाय ने आपत्ति जताई थी। इसके चलते दोनों समुदायों के बीच तनाव बढ़ गया था और प्रदर्शन के दौरान पुलिस को बल प्रयोग भी करना पड़ा था। राजनीतिक स्तर पर भी इस मुद्दे ने तूल पकड़ा था। मामले की गंभीरता को देखते हुए हाई कोर्ट ने पहले प्रतिमा के उद्घाटन पर रोक लगाई थी, हालांकि स्थापना की अनुमति दी गई थी।
इसके साथ ही राज्य सरकार को निर्देश दिया था कि वह समिति गठित कर विवाद का समाधान निकाले। इसी क्रम में समिति बनाई गई थी, जिसे अब अदालत ने 60 दिन के भीतर रिपोर्ट प्रस्तुत करने को कहा है। सुनवाई के दौरान हरियाणा सरकार ने अदालत से यह स्पष्ट करने का आग्रह किया कि पूर्व आदेश में ‘क्षत्रिय’ शब्द का प्रयोग क्यों किया गया, जबकि विवाद विशेष रूप से गुर्जर और राजपूत समुदाय के बीच था।
इस पर अदालत ने साफ किया कि वह अदालत का निष्कर्ष नहीं बल्कि राज्य के वकील की दलील का हिस्सा था। खंडपीठ ने यह भी कहा कि अदालतें हर याचिका पर विस्तृत आदेश देने के लिए बाध्य होती हैं, भले ही उसमें कोई ठोस आधार न हो। चीफ जस्टिस ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि कोई भी व्यक्ति जनहित याचिका दाखिल कर देता है और अदालत से निर्णय की अपेक्षा करता है, जबकि कई मामलों में कोई वास्तविक विवाद ही नहीं होता।
अदालत ने चेतावनी दी कि इस प्रकार की ‘तुच्छ याचिकाओं’ पर भविष्य में जुर्माना भी लगाया जा सकता है, ताकि न्यायालय का समय महत्वपूर्ण मामलों के लिए सुरक्षित रह सके। अदालत ने याचिका का निपटारा करते हुए सभी पक्षों को निर्देश दिया कि वे समिति की प्रक्रिया में सहयोग करें और जब तक रिपोर्ट नहीं आ जाती, तब तक सार्वजनिक बयानबाजी और इंटरनेट मीडिया पर विवाद को हवा देने से बचें।
