21 मार्च 2026 : इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने एक बेहद महत्वपूर्ण और मानवीय फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि गर्भ में पल रहा बच्चा 5 महीने (20 सप्ताह) से अधिक का है, तो कानून की नजर में वह एक जीवित व्यक्ति के समान माना जाएगा। ऐसे में यदि किसी दुर्घटना में उसकी मौत होती है, तो उसका परिवार अलग से मुआवजा पाने का हकदार है।
क्या था पूरा मामला?
मिली जानकारी के मुताबिक, यह मामला 2 सितंबर 2018 की एक दुखद घटना से जुड़ा है। भानमती नाम की एक महिला, जो 8 से 9 महीने की गर्भवती थी, ट्रेन में चढ़ते समय गिरकर गंभीर रूप से घायल हो गई थी। अस्पताल में इलाज के दौरान महिला और उसके पेट में पल रहे बच्चे, दोनों की मौत हो गई।
रेलवे अधिकरण ने मुआवजे से किया था इनकार
शुरुआत में रेलवे दावा अधिकरण (RCT) ने महिला की मौत के लिए तो 8 लाख रुपए का मुआवजा मंजूर किया, लेकिन अजन्मे बच्चे के लिए कोई भी राहत देने से साफ इनकार कर दिया। रेलवे का तर्क था कि भ्रूण को एक अलग इकाई या व्यक्ति नहीं माना जा सकता। इसके खिलाफ पीड़ित परिवार ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी और फैसला
जस्टिस प्रशांत कुमार की पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए रेलवे के तर्क को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि 5 महीने से अधिक का भ्रूण एक स्वतंत्र जीवन की तरह है। उसकी मृत्यु को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। रेलवे अधिनियम के तहत अधिकारी दुर्घटना में हुई हर जनहानि के लिए जवाबदेह हैं, जिसमें अजन्मे बच्चे की मौत भी शामिल है।कोर्ट ने आदेश दिया कि रेलवे अधिकरण अब उस बच्चे की मौत के लिए भी परिवार को अलग से मुआवजा राशि प्रदान करे।
आम जनता के लिए क्यों जरूरी है यह फैसला?
अदालत के इस आदेश से भविष्य में होने वाली दुर्घटनाओं में गर्भवती महिलाओं और उनके परिजनों को बड़ी कानूनी राहत मिलेगी। अब तक अजन्मे बच्चे की मौत को अक्सर केवल महिला की शारीरिक क्षति का हिस्सा माना जाता था, लेकिन अब उसे एक अलग व्यक्ति मानकर इंसाफ सुनिश्चित किया जाएगा।
