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FIR रद्द करने के अधिकार के इस्तेमाल में बरती जाए सतर्कता: इलाहाबाद हाईकोर्ट

प्रयागराज 31 अक्टूबर 2025 : इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा है कि एक प्राथमिकी या आपराधिक मुकदमे को रद्द करने के अधिकार का सावधानीपूर्वक उपयोग किया जाना आवश्यक है और यह केवल उन दुर्लभ मामलों में होना चाहिए जिसमें शिकायत या प्राथमिकी में किसी संज्ञेय अपराध का खुलासा नहीं होता या जिसमें जांच जारी रहने से कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।

न्यायमूर्ति चंद्रधारी सिंह और न्यायमूर्ति लक्ष्मीकांत शुक्ला की पीठ ने इस टिप्पणी के साथ एक प्राथमिकी को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी। यह याचिका इस आधार पर दायर की गई थी कि उक्त प्राथमिकी समान तथ्यों और आरोपों पर एक दूसरी प्राथमिकी है जो दुर्भावना से प्रेरित होकर दर्ज कराई गई है। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने दलील दी कि शुभम अग्निहोत्री द्वारा पूर्व में उसी थाने में दर्ज कराई गई प्राथमिकी की पहले ही जांच की जा चुकी है और उनके खिलाफ कोई अपराध नहीं पाया गया। अदालत ने इस मामले में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए कहा कि दूसरी प्राथमिकी पर रोक तभी लागू होती है जब दोनों प्राथमिकी समान घटना या लेनदेन से संबंधित हों। 

अदालत ने बृहस्पतिवार को दिए अपने निर्णय में कहा कि यदि दूसरी प्राथमिकी में ताजा तथ्यों के आधार पर नए और अलग अपराधों का खुलासा होता हो तो उसे दर्ज कराने में कोई कानूनी रोक नहीं है। पारुल बुद्धिराजा और तीन अन्य लोगों द्वारा दायर रिट याचिका खारिज करते हुए अदालत ने कहा, टी टी एंटनी बनाम केरल सरकार (2001) के मामले में उच्चतम न्यायालय का निर्णय समान लेनदेन या घटना के संबंध में दूसरी प्राथमिकी पर रोक लगाता है, लेकिन एक अलग घटना के आधार पर दूसरी प्राथमिकी पर यह रोक नहीं लगाता। 

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