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108 पुजारियों वाले मंदिर का राज, हर मन्नत होती है पूरी!

कांगड़ा 17 जनवरी 2025 . देवभूमि हिमाचल की पावन धरा पर देव संस्कृति और देव परंपरा बसी है. जहां दैविक कहानियों में प्राचीन इतिहास की झलक देखने को मिलती है. रामायण से लेकर महाभारत काल तक के कुछ ऐसे पुराने किस्से जो बार-बार इस बात का एहसास कराती हैं कि हिंदू संस्कृति और संस्कृति का इतिहास प्राचीनतम ही नहीं, बल्कि सत्यता से भी परिपूर्ण है. इसी कड़ी में आज हम आपको बताने जा रहे हैं हिमाचल प्रदेश के जिला कांगड़ा के पालमपुर के साथ नागवन के सबसे ऊंचे धौलाधार श्रृंखला के शिखर पर, पंचरुखी के पास चंगर की वादियों में एक पहाड़ की चोटी पर स्थित मां आशापुरी के मंदिर के बारे में, जहां मां साक्षात विराजमान हैं. यहां के लोगों का मानना है कि जो भी भक्त यहां सच्चे मन से दर्शन के लिए आते हैं, मां उनकी मनोकामनाएं जरूर पूर्ण करती हैं.

पांडवों से जुड़ा है मंदिर का इतिहास
कहा जाता है कि जिला कांगड़ा के इस प्रसिद्ध मंदिर का निर्माण उस समय हुआ जब महाभारत काल में पांडव अपने अज्ञातवास के दौरान यहां आए थे. 16वीं सदी में इस मंदिर का निर्माण कटोच वंशज के सुप्रसिद्ध राजा मान सिंह ने करवाया था. मंदिर में पहुंचने वाले भक्तों को यहां आकर स्वर्ग जैसे आनंद का अनुभव होता है.

आशापूरी मंदिर एक ऐतिहासिक स्थान भी है, जो शुरू से ही अपनी मंदिर निर्माण की विशेष कला के लिए चर्चाओं में रहता है. जिस वजह से इस मंदिर को पुरातत्व विभाग की देख-रेख में रखा गया है. मंदिर के अंदर मां तीन पिंडियों के रूप में विराजमान हैं. सुंदर पहाड़ी पर बड़ा यह मंदिर प्राकृतिक सौंदर्य का भी प्रतीक है. मंदिर के 108 पंडित हैं जो प्रतिदिन बदलते हैं व रोजाना विधिविधान से मंदिर में पूजा अर्चना करते हैं.

मंदिर में है एक रहस्यमई गुफा
मंदिर से कुछ दूरी पर एक गुफा में बाबा भेड़ू नाथ के दर्शन भी होते हैं. जहां आकर लोग अपने पशुओं की रक्षा के लिए बाबा से मन्नतें मांगते हैं. मंदिर के आस-पास बहुत ही मनमोहक दृश्य देखने को मिलते हैं. यहां की हरी-भरी पहाड़ियां और छोटी नदियां मंदिर की सुंदरता में चार चांद लगा देती हैं और दर्शन के बाद आपको स्वर्ग सा अनुभव होता है.

मंदिर तक ऐसे पहुंचें, यह समय आने के लिए बेस्ट
कुछ समय पहले मंदिर के पास बहुत कम लोगों का आना-जाना होता था, लेकिन जैसे-जैसे मंदिर की प्रसिद्धि बढ़ रही है, वैसे-वैसे लोग मंदिर के आसपास बसने शुरु हो गए हैं. मंदिर जाने के लिए आप अपने निजी वाहन या टैक्सी करके भी जा सकते हैं. परंतु कुछ पैदल रास्ता भी है जो सीढ़ीयों के रास्ते आपको तय करना होगा. सीढ़ीयों की यात्रा के लिए यहां आपको कोई सवारी सुविधा नहीं मिलेगी. माना जाता है कि अप्रैल से अक्टूबर का समय यहां आने के लिए सही रहता है. ठंड की बात करें, तो इन दिनों यहां बहुत ज्यादा ठंड पड़ती है.

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